धमतरी के नाथूकोन्हा गांव के बाशिंदों को अपनी समस्या दूर करने के लिए दशरथ मांझी बनना पड़ा.
विकास का पहिया तेजी से घूमने के लिए सड़क जरुरी है.क्योंकि सड़क जितनी अच्छी होगी विकास का चक्का उतनी ही तेजी से घूमेगा.लेकिन धमतरी के एक गांव के लोगों को विकास के इसी सड़क को पाने के लिए 24 साल से ज्यादा समय तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े. पांच किलोमीटर कच्चे रास्ते को पक्का करने की मांग जब पूरी नहीं हुई तो उन्होंने अपने हाथों में खुद फावड़ा लेकर दशरथ मांझी बनने का संकल्प लिया. इसके बाद विकास की राह में बाधा बन रहे 250 मीटर लंबे पहाड़ का सीना चीरकर 1600 मीटर अस्थायी सड़क का निर्माण कर दिया. जिससे पांच किलोमीटर घूमकर आने जाने वाली कच्ची और पथरीली सड़क के बदले अब ग्रामीण नए पहाड़ी रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं. आईए जानते हैं उस गांव की कहानी जहां हर कोई है दशरथ मांझी.
बारिश में टूट जाता था गांव का संपर्क : धमतरी के नाथूकोन्हा गांव में रहने वाले 140 लोगों का संपर्क बारिश के मौसम में दूसरे गांवों से टूट जाता था. वजह थी सड़क,क्योंकि जो सड़क इस गांव के लिए बनीं वो इतनी जर्जर है कि वाहनों का आवागमन बारिश के मौसम में बड़ी मुश्किल से हो पाता है. नाथूकोन्हा गांव के लोग पिछले 25 साल से प्रशासन से सड़क बनाने की मांग कर रहे थे. आपको बता दें कि नाथूकोन्हा गांव के ग्रामीण छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के शासन काल से सड़क की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. ग्रामीण जंगल की घाटी और पथरीले रास्तों से सफर कर रहे हैं. बारिश में तो इन फिसलन भरे रास्तों में चलना और भी मुश्किल हो जाता है. जोगी काल से शुरु हुई मांग विष्णु शासन तक आ पहुंची,लेकिन ना तो जोगी ने सुनी और ना ही विष्णु जी की कृपा ग्रामीणों पर बरसी. लिहाजा ग्रामीणों ने अपनी समस्या का समाधान खुद ढूंढा. लेकिन इससे पहले आईए आपको दिखाते हैं उस सड़क का हाल जो 25 साल बाद भी पक्की नहीं हो सकी है.
केरेगांव के लिए ग्रामीणों की मेहनत : नाथूकोन्हा गांव के लोगों को अपनी जरुरत का सामान केरेगांव से मिलता है.लिहाजा केरेगांव उनके लिए एक ऐसी जगह है जहां ग्रामीणों के हर दर्द की दवा है. नाथूकोन्हा गांव के लोगों को राशन,स्कूल, मेडिकल और दूसरे जरुरी काम के लिए केरेगांव आना जाना पड़ता था. इस सफर को ग्रामीण 1600 मीटर लंबे पहाड़ी रास्ते को पार करके पूरा करते थे. हालांकि नाथूकोन्हा के ग्रामीणों को केरेगांव जाने के लिए दूसरी सड़क मिली है,लेकिन ये 5 किलोमीटर लंबी सड़क इतनी लंबी और जर्जर है कि इससे होकर जाना मतलब समय की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं.इसलिए ज्यादातर ग्रामीण पहाड़ी रास्ते का ही इस्तेमाल करते हैं.
पहाड़ काटकर बना दिया रास्ता : नाथूकोन्हा के ग्रामीण जब सरकारी महकमे से फरियाद लगाकर थक गए तो उन्होंने माउंटेन मैन दशरथ मांझी की राह पर चलने का फैसला लिया.गांव के हर एक शख्स ने हाथ में कुदाल और फावड़ा लिया और जुट गया, 250 मीटर लंबे और 25 फीट ऊंचे पहाड़ को धराशायी करने. आखिरकार वो दिन आया और केरेगांव की ओर जाने वाला रास्ता पहाड़ के बीच से बन गया. फिर भी इस पहाड़ी रास्ते को सुधारने की प्रशासन ने कभी जहमत नहीं उठाई.हर साल बारिश में रास्ता खराब हो जाता है.
बारिश में रास्ता हो जाता था बर्बाद : पहाड़ी रास्ते की सबसे बड़ी दिक्कत बारिश के समय सामने आती थी.क्योकि पहाड़ से नीचे उतरने वाला पानी रास्ता खराब कर देता था.जिससे ग्रामीणों को आवागमन में परेशानी होती थी. इस 16 सौ मीटर सड़क को बनाने के लिए भी ग्रामीणों ने जिला प्रशासन का दरवाजा खटखटाया.लेकिन अफसोस फिर से ग्रामीणों को चक्के की तरह सिर्फ चक्कर ही कटवाया गया.इसलिए अब ग्रामीणों ने खुद के पैसों से जेसीबी की व्यवस्था करवाई और पहाड़ी रास्ते से बोल्डर हटवाकर एक बार फिर सड़क निर्माण कर दिया. जिससे अब ग्रामीण बारिश में भी केरेगांव आसानी से आ जा रहे हैं.
25 सालों से सड़क की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं.लेकिन मांगों को अनसुना कर दिया जाता है. प्रशासन को कई बार आवेदन देने के बाद भी मांगें नही सुनी तो ग्रामीणों ने बैठक करके फैसला लिया कि गांव में लोग श्रमदान करके सड़क बनाएंगे. ग्रामीणों ने दिन रात एक करके सड़क का निर्माण किया है-अकबर मंडावी, सरपंच नाथूकोन्हा गांव
हमें छोटे से छोटे काम के लिए केरेगांव आना जाना पड़ता है.राशन चाहिए तो केरेगांव जाओ, स्कूल भेजो तो केरेगांव और दवा इलाज के लिए भी केरेगांव में ही आना जाना करते हैं.इस सड़क के लिए हम लोगों ने अधिकारियों को कहा था.लेकिन किसी ने भी सड़क नहीं बनवाया.अब हम लोगों ने मिलकर सड़क की मरम्मत की है.जेसीबी की मदद से बड़े पत्थरों को हटाया है.पहले गाड़ी केरेगांव आ जा नहीं सकती थी.लेकिन अब पत्थर हट जाने से गाड़ी हमारे गांव में आ सकती है-सत्यनारायण मंडावी, पंच नाथूकोन्हा गांव
सड़क बन जाने से हमारे गांव की सबसे बड़ी परेशानी दूर हुई है.सड़क नहीं होने की वजह से हमें काफी परेशानी होती थी.बारिश में रास्ता खराब हो जाता था.जिसके कारण दुर्घटना हो सकती थी.लेकिन अब हम लोगों ने मिलकर इसका समाधान निकाला है.सड़क की मरम्मत हो चुकी है.फिर भी हमारी प्रशासन से गुजारिश है कि रोड को पक्का बनवा दिया जाए,ताकि बार-बार रोड खराब ना हो- शंकर सलाम, ग्रामीण
इसी गांव के ग्रामीणों ने सालों पहले 25 फीट ऊंचे और 250 फीट लम्बे पहाड़ को काटकर गांव के लिए नई सड़क बनाई है. नाथूकोन्हा गांव की मिसाल की जानकारी धमतरी कलेक्टर को लगते ही वो भी हैरान हो गए. कलेक्टर ने ग्रामीणों की मेहनत को सराहा है.
श्रमदान से सड़क निर्माण करने के लिए मैं उन्हें धन्यवाद दे रहा हूं. आने वाले दिनों में नाथूकोन्हा गांव का विजिट करेंगे.प्रशासन की ओर से जो भी मदद हो सके किया जाएगा- अबिनाश मिश्रा, कलेक्टर
आपको बता दें कि नाथूकोन्हा गांव पहले भी सुर्खियों में आ चुका है. गांव का नक्शा बदलने में दो साल लगे थे. जून 2016 में लोकसुराज अभियान के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह जब इस गांव में पहुंचे थे तो उन्होंने इस प्रयास के लिए ग्रामीणों की पीठ भी थपथपाई थी. इसी दौरान गांववालों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री से पक्की सड़क की मांग की थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था . प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत माडमसिल्ली डैम तक आने जाने के लिए 1 करोड़ 97 लाख रुपये की लागत से करीब ढ़ाई किलोमीटर तक सीमेंट कंक्रीट रोड बनी थी.लेकिन अब जब केरेगांव के लिए सड़क बनाने की बारी आई तो किसी ने भी ग्रामीणों की नहीं सुनी.लिहाजा श्रमदान करके नाथूकोन्हा के ग्रामीणों ने अपनी समस्या का समाधान ढूंढ लिया.




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